पाठ्यक्रम: जीएस-3/ पर्यावरण
सन्दर्भ
- संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण विश्व एक साथ जलवायु संकट और ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। उन्होंने स्वच्छ ऊर्जा की ओर तीव्र संक्रमण तथा जलवायु अनुकूलन उपायों को सुदृढ़ करने का आह्वान किया।
दोहरे संकट की स्थिति
- जलवायु परिवर्तन के निर्णायक बिंदु (Climate Tipping Points): विश्व ने अब तक के 11 सबसे गर्म वर्षों का अनुभव किया है तथा आने वाले वर्षों में औसत वैश्विक वार्षिक तापमान के पेरिस समझौते के तहत निर्धारित 1.5°C की सीमा से अधिक होने की आशंका है।
- इसके परिणामस्वरूप प्रवाल भित्ति
पारिस्थितिकी तंत्र के ध्वस्त होने का खतरा बढ़ रहा है। ग्रीनलैंड एवं पश्चिम अंटार्कटिका की हिम चादरों का पिघलना तेज हो रहा है। इसके अलावा प्रमुख महासागरीय परिसंचरण प्रणालियाँ कमजोर पड़ रही हैं एवं अमेज़न वर्षावन के कुछ भाग सवाना जैसी परिस्थितियों की ओर परिवर्तित हो रहे हैं।
- ऊर्जा संकट: हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में हुए संघर्षों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में अत्यधिक अस्थिरता उत्पन्न कर दी है, जिससे यह स्पष्ट हुआ है कि जीवाश्म ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर विकास मॉडल कितने संवेदनशील हैं।
विद्युत ग्रिड की बाधाएँ
- जीवाश्म ईंधन कंपनियों का अप्रत्याशित लाभ:भू-राजनीतिक संघर्षों के दौरान ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण तेल एवं गैस कंपनियों को अतिरिक्त लाभ प्राप्त हुआ है।
- इससे स्वच्छ ऊर्जा में निवेश को प्रोत्साहन मिलने के बजाय उसमें कमी आती है।
- विद्युत ग्रिड की बाधाएँ: अनेक देशों में विद्युत संचरण एवं वितरण अवसंरचना पर्याप्त विकसित नहीं है।
- वर्तमान विद्युत ग्रिड नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को प्रभावी रूप से समाहित नहीं कर पाते, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं में विलंब होता है।
- ऊर्जा भंडारण सुविधाओं की कमी भी नवीकरणीय ऊर्जा के व्यापक उपयोग में बाधा बनती है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) डेटा केंद्र: डेटा केंद्रों के संचालन के लिए अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा एवं जल की आवश्यकता होती है, जिससे ऊर्जा संकट तथा जलवायु परिवर्तन की समस्या और गंभीर हो जाती है।
- अपर्याप्त जलवायु वित्त: विकासशील देशों के पास स्वच्छ ऊर्जा एवं जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं में निवेश के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
- वर्तमान जलवायु वित्तीय प्रतिबद्धताएँ इस चुनौती के स्तर की तुलना में अभी भी अपर्याप्त हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा क्यों महत्त्वपूर्ण है?
- लागत में कमी:पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा बैटरी भंडारण की लागत में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जिससे ये जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोतों की तुलना में अधिक किफायती एवं प्रतिस्पर्धी बन गए हैं।
- आर्थिक लाभ:नवीकरणीय ऊर्जा जीवाश्म ईंधनों के आयात पर निर्भरता कम करती है।
- साथ ही यह विनिर्माण, स्थापना एवं रखरखाव जैसे क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न करती है।
- पर्यावरणीय एवं सामरिक लाभ:तेल एवं गैस पर निर्भरता देशों को भू-राजनीतिक तनावों एवं आपूर्ति व्यवधानों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। जीवाश्म ईंधनों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आर्थिक अनिश्चितता को बढ़ाता है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा अपेक्षाकृत अधिक स्थिर एवं सुरक्षित विकल्प प्रदान करती है।
मीथेन उत्सर्जन में कमी हेतु वैश्विक आह्वान
- संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने मीथेन पर वैश्विक कार्यवाही का आह्वान प्रारम्भ किया है, जिसका लक्ष्य अपशिष्ट, कृषि तथा जीवाश्म ईंधन परिचालनों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को कम करना है।
- मीथेन एक हरितगृह गैस के रूप में: मीथेन एक अत्यधिक प्रभावशाली हरितगृह गैस है, जिसका अल्पकालिक तापवर्धक प्रभाव बहुत अधिक होता है। 20 वर्षों की अवधि में यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 80 गुना से अधिक ऊष्मा को अवशोषित करने में सक्षम है।
- औद्योगिक क्रांति-पूर्व काल से अब तक हुए वैश्विक तापवृद्धि के लगभग 30% के लिए मीथेन उत्तरदायी है।
जलवायु एवं ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में भारत के प्रयास
- राष्ट्रीय सौर मिशन (NSM): वर्ष 2010 में प्रारम्भ किया गया। इसका उद्देश्य ग्रिड से जुड़े एवं ऑफ-ग्रिड सौर ऊर्जा संयंत्रों सहित सौर ऊर्जा क्षमता का व्यापक विस्तार करना है।
- राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा कोष (NCEF): स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने तथा हरितगृह गैस उत्सर्जन में कमी लाने वाली परियोजनाओं के समर्थन हेतु स्थापित किया गया।
- नवीकरणीय ऊर्जा क्रय दायित्व (RPO): इसके अंतर्गत विद्युत वितरण कंपनियों एवं बड़े उपभोक्ताओं को अपनी कुल विद्युत आवश्यकता का एक निश्चित भाग नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त करना अनिवार्य किया गया है।
वित्तीय सहायता एवं प्रोत्साहन:
- बड़े पैमाने की सौर एवं हाइब्रिड परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF)।
- सौर फोटोवोल्टिक (PV) विनिर्माण हेतु उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना।
- रूफटॉप सौर एवं ऑफ-ग्रिड प्रणालियों के लिए सब्सिडी।
- हरित विद्युत व्यापार को बढ़ावा देने हेतु नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (RECs)।
अवसंरचना विकास:
- नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर ग्रिड एकीकरण हेतु ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर।
- कृषि पम्पों के सौरकरण के लिए पीएम-कुसुम योजना।
- विद्युत वितरण कंपनियों को सुदृढ़ बनाने हेतु पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS)।
- पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना: वर्ष 2024 में प्रारम्भ की गई यह विश्व की सबसे बड़ी घरेलू रूफटॉप सौर ऊर्जा पहल है, जिसका उद्देश्य आवासीय क्षेत्रों में रूफटॉप सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना है।
- भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net Zero) उत्सर्जन प्राप्त करने तथा अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं के अंतर्गत सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन एवं निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना तथा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है।
आगे की राह
- संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने मीथेन उत्सर्जन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए सरकारों एवं उद्योगों के लिए तीन प्रमुख कदम सुझाए हैं—
- प्रत्येक रिसाव का पता लगाकर उसे शीघ्र ठीक किया जाए तथा नियमित फ्लेयरिंग (Flaring) एवं कोल्ड वेंटिंग (Cold Venting) को समाप्त किया जाए।
- उत्सर्जन को मापने योग्य, प्रतिवेदनीय तथा सत्यापन योग्य बनाया जाए।
- विज्ञान-आधारित वैश्विक मीथेन मानक अपनाया जाए तथा लगभग शून्य-मीथेन ऊर्जा (Near-Zero Methane Energy) के लिए बाज़ार विकसित किया जाए।
- अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, वर्तमान उपलब्ध प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके तेल एवं गैस क्षेत्र से होने वाले लगभग 70% मीथेन उत्सर्जन को समाप्त किया जा सकता है, और इसका अधिकांश भाग बहुत कम अथवा बिना किसी अतिरिक्त शुद्ध लागत के संभव है।
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